फूलों की खेती, या फ्लोरीकल्चर, से तात्पर्य व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए फूलों एवं सजावटी पत्तों वाले पौधों की खेती करना है। भारतीय परिपेक्ष्य में बात करें तो यह क्षेत्र फूलों एवं सजावटी पौधों की प्रोसेसिंग और व्यापार के मामले में लगातार बढ़ रहा है, जिनका इस्तेमाल कई अलग-अलग कार्यों के लिए किया जाता है। इसे 'सनराइज़ इंडस्ट्री' भी कहा जाता है। आज के आर्टिकल में, हम भारत में फ्लोरीकल्चर के महत्व, इसके प्रकार, इसके लिए ज़रूरी टेक्नोलॉजी, सरकारी मदद एवं इसमें आने वाली चुनौतियों के बारे में विस्तार से जानेंगे। तो, बिना किसी और देरी के, आइए फ्लोरीकल्चर की इस खूबसूरत दुनिया की सैर पर निकल पड़ें।
आइए सबसे पहले यह समझते हैं कि फ्लोरीकल्चर क्या है – यह बागवानी की एक शाखा है जिसमें सजावटी पौधों की खेती, प्रोसेसिंग एवं मार्केटिंग शामिल है। आसान शब्दों में कहें तो, फूलों को उगाने को फ्लोरीकल्चर कहते हैं। दूसरे शब्दों में, फ्लोरीकल्चर खेती विभिन्न उपयोगों के लिए, जिनमें औषधीय एवं सजावटी उपयोग भी शामिल हैं, फूलों की अलग-अलग किस्मों की व्यावसायिक खेती है।
राष्ट्रीय बागवानी डेटाबेस के अनुसार, 2023-24 में फ्लोरीकल्चर का कुल उत्पादन 2284 हज़ार टन (खुले फूल) एवं 947 हज़ार टन (कटे हुए फूल) था, और फ्लोरीकल्चर खेती के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल 285 हज़ार हेक्टेयर था।
बड़े पैमाने पर फ्लोरीकल्चर करने वाले मुख्य राज्य महाराष्ट्र, गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक एवं तमिलनाडु हैं। भारत में फ्लोरीकल्चर उत्पादों का 50% से अधिक हिस्सा मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से आता है।
देश ने वर्ष 2024-25 में दुनिया को 749.17 करोड़ रुपये (88.58 मिलियन अमेरिकी डॉलर) मूल्य के 21,024.41 मीट्रिक टन फूलों के उत्पाद निर्यात किए हैं।
इसी अवधि के दौरान, अमेरिका, नीदरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी और मलेशिया भारतीय पुष्प-कृषि के प्रमुख आयातक देश थे।
भारत की भौगोलिक एवं रणनीतिक स्थिति बहुत अच्छी है, क्योंकि यह पूर्वी एशिया एवं यूरोप जैसे बड़े फूलों के बाज़ारों के करीब स्थित है। भारत सरकार ने फ्लोरीकल्चर उद्योग को 100% निर्यात-उन्मुख उद्योग का दर्जा दिया है। रीफर वैन, प्री-कूलिंग चैंबर एवं कोल्ड स्टोर जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए कई निर्यात-उन्मुख इकाइयाँ स्थापित की गई हैं। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) भारतीय फ्लोरीकल्चर एवं इसके विभिन्न पहलुओं—जैसे प्रचार, विकास एवं निर्यात—की देखरेख करता है।

पुष्प-कृषि के मुख्य प्रकारों में कटे हुए फूल, खुले फूल, गमले वाले पौधे, नर्सरियाँ और इत्र शामिल हैं। पुष्प-कृषि के इन प्रकारों पर नीचे चर्चा की गई है:
|
फ्लोरीकल्चर के प्रकार |
उपयोग |
उदहारण |
|
कटे-फूल |
समारोह, सजावट, फूलों की टोकरियाँ एवं गुलदस्ते। |
ऑर्किड, गुलाब, कार्नेशन, लिली एवं ट्यूलिप। |
|
खुले-फूल |
बालों के आभूषण एवं फूलों के गहने, रंगोली की सजावट, धार्मिक चढ़ावे, मालाएँ एवं गुलदस्ते। |
कनेर, चमेली, गेंदा और गुलाब। |
|
पॉटेड-पौधे |
होटल, कॉर्पोरेट कार्यालय, घर एवं मॉल जैसी इनडोर और आउटडोर सजावट की जगहें। |
मनी प्लांट, फर्न एवं मारान्टा। |
|
नर्सरी |
पौधे, पूरी तरह से विकसित पौधे एवं फूल। |
सूरजमुखी, गेंदा, चमेली और गुलाब। |
|
परफ्यूम |
फूलों के अर्क, एसेंशियल ऑयल्स, आदि। |
रजनीगंधा, केवड़ा, चमेली एवं गुलाब। |
भारतीय बाज़ार में फूलों की खेती की कई तरह की फसलें उपलब्ध हैं। फूलों की खेती की सबसे लोकप्रिय फसलों के बारे में नीचे बताया गया है:
भारत में फूलों की खेती के क्षेत्र में गुलाब सबसे प्रमुख फूल है। इसका उपयोग कटे हुए फूलों, गुलदस्तों एवं बगीचे के पौधों के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग एसेंशियल ऑयल, गुलकंद (एक तरह का प्रोसेस्ड फ़ूड) एवं गुलाब जल बनाने में भी किया जाता है। गुलाब के फूलों के आकार, रूप एवं रंग अलग-अलग होते हैं - लाल से लेकर सफ़ेद और भी कई तरह के। भारत में गुलाब की अलग-अलग किस्में हैं, जैसे हाइब्रिड टी रोज़, ग्रैंडिफ्लोरा रोज़, फ्लोरिबंडा रोज़, आदि। भारत में गुलाब उगाने वाले मुख्य राज्य कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल हैं।
गेंदा भारत में आमतौर पर उगाया जाने वाला फूल है, जिसका उपयोग बगीचों की सजावट में और मालाएँ बनाने के लिए खुले फूलों के रूप में बड़े पैमाने पर किया जाता है। अपनी तेज़ी से होने वाली बढ़त और कम निवेश के कारण यह फूल-खेती की एक लोकप्रिय फ़सल है। यह कम समय में तैयार होने वाली फ़सल है एवं इसका आकार आकर्षक तथा रंग बहुत चटक होता है। इसका उपयोग ज़्यादातर दशहरा एवं दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान किया जाता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात एवं आंध्र प्रदेश भारत में गेंदा फूल उगाने वाले प्रमुख राज्य हैं।
कार्नेशन दूसरी सबसे प्रमुख फ़सल है, जिसे ज़्यादातर व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए पसंद किया जाता है, क्योंकि यह लंबे समय तक ताज़ा रहता है, इसके रंगों की बहुत बड़ी रेंज उपलब्ध है, यह लंबी दूरी के परिवहन को झेल सकता है एवं इसमें दोबारा ताज़ा होने की अद्भुत क्षमता होती है। यह एक महत्वपूर्ण 'कट फ़्लावर' (कटे हुए फूल) फ़सल है, जिसकी खेती पूरी दुनिया में की जाती है। इसके रंगों की बहुत बड़ी रेंज है, जिसमें पीला, गुलाबी, लैवेंडर, सफ़ेद आदि शामिल हैं। भारत में, इसकी खेती हिमाचल प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, जम्मू एवं कश्मीर तथा कर्नाटक में की जाती है।
ट्यूलिप अपने कप जैसे आकार एवं चटक रंगों के कारण बगीचों के सबसे लोकप्रिय फूलों में से एक हैं। यह अंडे या कप के आकार का फूल होता है, जिसमें छह पंखुड़ियाँ होती हैं। यह कई रंगों में आता है, जैसे नारंगी, गुलाबी, चेरी, मैजेंटा, सैल्मन, गहरा लाल, बैंगनी आदि। ट्यूलिप 'कट फ़्लावर', फूलों की क्यारियों और गमलों के लिए बेहतरीन होते हैं, इन्हें खुले में एवं पॉलीहाउस जैसी सुरक्षित जगहों पर भी उगाया जाता है। इनकी खेती मुख्य रूप से जम्मू और कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश में की जाती है।
ऑर्किड विदेशी मूल के फूल हैं, जिनकी पहचान उनके चटक रंगों की विस्तृत श्रृंखला से होती है; इनके रंग लाल, बैंगनी, गहरा बैंगनी, पीला, गुलाबी एवं सफ़ेद तक हो सकते हैं। भारतीय 'कट फ़्लावर' उद्योग में ये सबसे ज़्यादा बिकने वाले फूलों में से एक हैं। भारत में इनका उपयोग मुख्य रूप से दो उद्देश्यों के लिए किया जाता है – विशेष अवसरों या त्योहारों पर सजावट के लिए 'कट फ़्लावर' के रूप में, और घरों तथा बगीचों की सुंदरता बढ़ाने के लिए गमलों में लगाए जाने वाले पौधों के रूप में। इनका उपयोग जड़ी-बूटी वाली दवाओं एवं पेय पदार्थों में भी किया जाता है। अरुणाचल प्रदेश, असम एवं सिक्किम भारत में ऑर्किड का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य हैं।
स्टेप 1: फूलों की खेती का बिज़नेस शुरू करने का पहला कदम मार्केट रिसर्च है। इस विषय पर सही जानकारी के साथ अपने खरीदारों की पहचान करें।
स्टेप 2: इसके बाद, चुनें कि आप किस तरह के फूलों के प्रोडक्ट उगाना और बेचना चाहते हैं।
स्टेप 3: अपनी खेती के लिए सही जगह एवं इंफ्रास्ट्रक्चर ढूंढें, जहाँ का मौसम खेती के लिए सही हो, और जहाँ अच्छी क्वालिटी का पानी और मिट्टी उपलब्ध हो।
स्टेप 4: बेहतर पैदावार के लिए अच्छी क्वालिटी के बीज चुनें। इसलिए, हमेशा फूलों की किस्मों, बीमारियों इत्यादि पर ध्यान दें।
स्टेप 5: संसाधनों एवं लागत को बेहतर बनाने के लिए ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग जैसी सिंचाई के तरीकों का इस्तेमाल करें।
स्टेप 6: सबसे ज़रूरी कदम फूलों के प्रोडक्ट की मार्केटिंग करना है। बिक्री के लिए चुने गए बाज़ार के आधार पर प्रतिस्पर्धी कीमतें, अच्छी क्वालिटी की पैकेजिंग, एवं अपने खरीदारों के लिए वैल्यू-एडेड सेवाओं पर विचार करें।
भारत में कटे हुए फूलों की सुरक्षित खेती के लिए ग्रीनहाउस का इस्तेमाल तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है। ग्रीनहाउस खेती में एक ढांचा बनाया जाता है जिसे ग्रीनहाउस कहते हैं, एवं जो प्लास्टिक फिल्म या कांच से ढका होता है। यह न केवल फूलों के लिए बढ़ने की आदर्श स्थितियां देता है, बल्कि पानी और ज़मीन जैसे संसाधनों का भी कुशलता से इस्तेमाल करता है। यह पूरे साल फूलों की पैदावार को भी बढ़ावा देता है, जिससे उपज में बढ़ोतरी होती है।
व्यावसायिक फूलों की खेती ग्रीनहाउस में एक हाई-टेक गतिविधि के तौर पर नियंत्रित जलवायु परिस्थितियों का इस्तेमाल करके की जाती है। किसान फूलों की खेती के बेहतरीन उत्पाद पाने के लिए नमी, तापमान एवं सूरज की रोशनी जैसे कई कारकों को नियंत्रित करते हैं। इस्तेमाल की गई टेक्नोलॉजी, बनाने की लागत और ग्रीनहाउस में इस्तेमाल सामग्री के आधार पर ग्रीनहाउस कम लागत वाला, मध्यम लागत वाला या हाई-टेक हो सकता है।
भारत सरकार ने फूलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। सरकार द्वारा की गई कुछ पहलें ये हैं:
बागवानी के एकीकृत विकास का मिशन (MIDH): यह मुख्य रूप से केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना है, जिसका मकसद बागवानी क्षेत्र का समग्र विकास करना है एवं इसमें सुगंधित पौधे और फूल शामिल हैं। MIDH के तहत हर लाभार्थी को ज़्यादा से ज़्यादा 2 हेक्टेयर ज़मीन के लिए दी जाने वाली वित्तीय सहायता इस प्रकार है:
कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA): कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) भारत में फूलों की खेती के निर्यात को बढ़ावा देने और उसके विकास के लिए ज़िम्मेदार है।
वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) फूलों की खेती मिशन: यह फूलों की खेती मिशन 22 राज्यों में लागू किया जा रहा है, जिसका मकसद CSIR की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके ज़्यादा कीमत वाली फूलों की खेती के ज़रिए किसानों की आय बढ़ाना एवं उद्यमिता को बढ़ावा देना है।
स्वच्छ पौधा कार्यक्रम (CPP): 2024 में मंज़ूर किए गए CPP का मकसद किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली, रोग-मुक्त रोपण सामग्री उपलब्ध कराना है। इसमें स्वस्थ रोपण सामग्री सुनिश्चित करने के लिए आधुनिक नर्सरियां एवं 9 स्वच्छ पौधा केंद्र स्थापित करना शामिल है।
भारत में फूलों की खेती आर्थिक, सामाजिक और सौंदर्य की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण उद्योग है। यह रोज़गार के अधिक अवसर पैदा कर सकता है और विदेशी मुद्रा की कमाई बढ़ा सकता है। लेकिन इस क्षेत्र में कुछ चुनौतियाँ भी हैं:
ज़मीन का छोटा आकार: आमतौर पर, फूलों की खेती करने वाले किसानों के पास ज़मीन का आकार बहुत छोटा होता है, जो उनके लिए बड़े पैमाने पर आधुनिक खेती के तरीकों में निवेश करने में बाधा बन जाता है।
ज्ञान की कमी: चूंकि यह कोई बहुत पुरानी अवधारणा नहीं है, इसलिए ऐसे सीमित संसाधन उपलब्ध हैं जो अधिक पैदावार वाली किस्मों, मिट्टी की जाँच एवं कीटनाशकों व उर्वरकों की सही मात्रा के बारे में मार्गदर्शन दे सकें।
कुशल श्रमिकों की अनुपलब्धता: फूलों की खेती से प्राप्त उपज की पौधों की सुरक्षा, कटाई एवं कटाई के बाद के कार्यों के लिए कुशल श्रमिकों का मिलना, एक और चुनौती है।
जलवायु परिवर्तन: अत्यधिक गर्मी, ठंड, लगातार बारिश आदि जैसे जलवायु परिवर्तनों का खुले खेतों में व्यावसायिक उत्पादन के तहत उगाए जाने वाले फूलों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।
बाज़ार एवं परिवहन की सुविधाओं की कमी: बाज़ार का न होना, उपज के जल्दी खराब होने की प्रकृति के कारण परिवहन में कठिनाइयाँ, फूलों की बिक्री के बाद भुगतान में देरी, ग्रेडिंग एवं भंडारण के लिए अपर्याप्त व्यवस्था आदि, फूलों की खेती के व्यवसाय में बाधाएँ बन रहे हैं।
|
फ्लोरीकल्चर |
हॉर्टिकल्चर |
|
फ्लोरीकल्चर फूलों को उगाने एवं उनका विपणन करने की प्रक्रिया है। |
इसमें पौधों की विभिन्न किस्मों को उगाने एवं उनका प्रबंधन करने का कार्य शामिल है। फ्लोरीकल्चर, बागवानी (Horticulture) की एक उप-शाखा है। |
|
इसमें व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए पत्तीदार पौधों एवं फूलों की खेती शामिल है। |
इसमें फलों, सब्जियों, सजावटी पौधों, फूलों आदि की खेती शामिल है। |
|
पुष्प-कृषि के अंतर्गत उगाई जाने वाली लोकप्रिय फसलें गुलाब, गेंदा, ट्यूलिप, लिली आदि हैं। |
बागवानी में उगाई जाने वाली लोकप्रिय फसलें केला, गाजर, मशरूम, काजू, जेरेनियम, ज़ुकिनी आदि हैं। |
भारत के फ्लोरीकल्चर (फूलों की खेती) क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है, जिससे देश की खेती-बाड़ी को बढ़ावा मिल रहा है एवं रोज़गार के नए मौके पैदा हो रहे हैं। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भी फ्लोरीकल्चर से जुड़े उत्पादों की मांग बढ़ रही है। इसलिए, फ्लोरीकल्चर को अपनाने एवं फूलों को एक्सपोर्ट (निर्यात) करने के मकसद से उगाकर ज़्यादा कमाई करने का यह बिल्कुल सही समय है। शहरीकरण, बदलती जीवनशैली एवं ई-कॉमर्स के बढ़ते चलन जैसे कारणों से ज़्यादा से ज़्यादा लोग फ्लोरीकल्चर से जुड़े उत्पाद खरीद रहे हैं। भारत के पास इस बढ़ती मांग को पूरा करने एवं विदेशी मुद्रा की कमाई बढ़ाने का एक बहुत बड़ा मौका है। फ्लोरीकल्चर के एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार को कुछ और 'एग्रो एक्सपोर्ट ज़ोन' (कृषि निर्यात क्षेत्र) शुरू करने चाहिए।
इसके अलावा, फूल देखने में बहुत सुंदर लगते हैं, इसलिए घरों एवं दफ़्तरों में सजावट के लिए इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। सामाजिक नज़रिए से भी ये बहुत अहम हैं, क्योंकि शादी-ब्याह एवं जन्मदिन की पार्टियों जैसे कई खास मौकों पर इनका इस्तेमाल होता है। यही नहीं, फूलों की प्रोसेसिंग करने वाला उद्योग भी इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है। इस उद्योग में फूलों से तेल और रंग (पिगमेंट्स) निकालने के साथ-साथ सूखे फूल बनाने का काम भी किया जाता है। इसलिए, उम्मीद है कि आने वाले सालों में भी फ्लोरीकल्चर से जुड़े उत्पादों का इस्तेमाल और बढ़ेगा, जिससे इस पूरे उद्योग पर एक सकारात्मक असर पड़ेगा।
फ्लोरीकल्चर को व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए विभिन्न पत्तीदार पौधों एवं फूलों की खेती के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया जाता है।
भारत में पुष्पकृषि (Floriculture) इसके आर्थिक महत्व तथा सामाजिक एवं सौंदर्यपरक दृष्टिकोणों के कारण महत्वपूर्ण है।
गुलाब, गेंदा, कार्नेशन एवं ट्यूलिप कुछ लोकप्रिय पुष्प-कृषि फसलें हैं।
पुष्प-कृषि के मुख्य प्रकारों में कटे हुए फूल, खुले फूल, गमले वाले पौधे, नर्सरियाँ एवं इत्र शामिल हैं।