कद्दू कुल के इस शब्जी को आमतौर पर खीरा, तोरी एवं लौकी जैसी बेल वाली सब्जियों के समान उगाया जाता है। परवल का उत्पादन प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश एवं उड़ीसा जैसें भारतीय राज्यों में किया जाता है।
परवल की खेती के लिए सामान्यतः गर्म एवं आर्द्र जलवायु उपयुक्त होती है। इसकी वृद्धि के लिए 25°C से 35°C तक का तापमान आइडियल होता है। परवल की खेती के लिए हल्की नमी की आवश्यकता होती है, लेकिन पानी जमा होने से बचाना चाहिए। वहीं मिटटी में, परवल की खेती के लिए बलुई दोमट या जैविक पदार्थों से भरपूर मिटटी उपयुक्त होती है। नदी किनारे की जलोढ़ मिट्टी बेस्ट होती है। जल निकासी वाली मिटटी परवल की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
काशी सुफल- यह किस्म उत्तर प्रदेश एवं बिहार की मिटटी एवं जलवायु के अनुसार उपयुक्त मानी जाती है। इस किस्म के फल सफ़ेद धारीदार के साथ हल्के हरे रंग के होते हैं। इस किस्म के परवल मिठाई बनाने के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं।
काशी अलंकार- परवल की यह किस्म उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड प्रदेश में खेती के लिए उपयुक्त है। यह अधिक उपज वाली किस्म है। इस किस्म के फल हल्के हरे रंग के होते हैं। इसकी किस्म की एक खासियत है कि इनके फलों में बहुत ही मुलायम बीज होता है।
स्वर्ण रेखा: इसके फल लम्बे धारीदार हरे रंग के होते हैं। काशी अलंकार के सामान ही इस किस्म के फलों का बीज मुलायम होता है।
स्वर्ण अलौकिक: इसका रंग हल्का हर होता है एवं यह मिठाई बनाने के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।
स्थान विशेष की जलवायु के अनुसार परवल की रोपाई का समय भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग होता है। मैदानी क्षेत्रों में परवल की रोपाई जुलाई से अक्टूबर तक एवं दियारा क्षेत्रों में सितंबर से अक्टूबर तक मानी जाती है।
परवल की खेती के लिए सबसे पहले भूमि का चुनाव आवश्यक है। इसके लिए भूमि ऊँची होनी चाहिए ताकि फसल के पूरी जीवनकाल में पानी जमाव की समस्या ना आए। अगर बारिश वाला प्रदेश हो, तो वहां समतल खेतों में भी ऊँचे-ऊँचें थाले या मेढ़ बनाकर फसल लगाने चाहिए, ताकि जमीन में पानी जमाव की समस्या ना आए। परवल को 3 तरीके से लगाया जा सकता है, जो निम्न है:
फसल लगाने की उपर्युक्त बताये गए तरीकों में पहली दो विधियाँ कारगर नहीं है। बीज को सीधे लगाने से जो पौधे निकलते हैं, उसमें से लगभग 60 से 80 प्रतिशत नर पौधे होते हैं। उल्लेखनीय है कि मादा पौधे में फल आता है, इस प्रकार पौधे की बहुत बड़ी संख्या हमारे काम की नहीं होती है। 10 मादा में केवल 1 नर पौधे की जरुरत होती है। इस प्रकार यह विधि लाभदायक नहीं है। जड़ों की कलम वाली विधि से पौधे तो जल्दी बढ़ते हैं, लेकिन इसकी एक समस्या है, जड़ वाली कलमों का उपलब्ध ना होना। तीसरी विधि ही सबसे ज्यादा कारगर मानी जाती है, जिसके तहत सीधे लता को गड्ढे में शोधित मिटटी के साथ लगाया जाता है। आप वैसे किसान जो पहले से परवल की खेती करते हैं, उनसे सीधे लता खरीद सकते हैं, एवं अपने खेतों में इसकी रोपाई कर सकते हौं, इसकी बाजार मूल्य सामान्यतः 7 से 8 रूपये मीटर की होती है।
नए पौधे का विकास उचित तरीके से हो सके, और पानी के अधिक संपर्क में परवल की बेलियाँ न आ सके इसके लिए दो तरह के तरीके अपनाए जाते हैं। पहली विधि में जमीन पर पैरा बिछाए जाते हैं, जिसके लिए फसल अवशेष के डंठल का प्रयोग किया जाता है। ऐसा करने से परवल की बेलियाँ सीधे जमीन के संपर्क में नहीं आती है एवं नमी का उचित स्तर बरकरार रहता है। दूसरे तरीके में बांस की 6 से 7 फीट की बल्लियों का प्रयोग कर ऊँचाई पर मचान बनाए जाते हैं।
परवल के फसल की निरंतर देखभाल करनी आवश्यक है। रोपाई के बाद से फसल लगने तक 4 से 5 बार निकाई गुड़ाई करनी आवश्यक है, ताकि लताओं की वृद्धि हो सके। इसके साथ ही परवल की बेलों की देखभाल में नियमित पानी देना, बेलों को सहारा देना, खरपतवारों की सफाई एवं आवश्यकतानुसार समय-समय पर उर्वरकों का उपयोग शामिल है। शुरुआत में पानी की अधिक आवश्यकता होती है, लेकिन परवल के पौधों को अधिक पानी जमा होने से बचाना चाहिए। इसके अलावा, बेलों को धूप से बचाने के लिए किसी प्रकार की छांव का इंतजाम भी किया जा सकता है। इसके साथ ही हानि पहुँचाने वाले कीटों से भी परवल के बेलों की रक्षा करनी होगी।
मैदानी क्षेत्रों में मार्च से अप्रैल महीने में फल आना शुरू हो जाता है। वहीँ नदी के किनारे वाले दियारा क्षेत्रों में पौधे पर फल फरवरी में ही नाने लगते हैं। फल के आने के 15 से 16 दिनों के बाद इसकी तुड़ाई की जा सकती है। ध्यान रहे फल की समय से तुड़ाई करते रहनी चाहिए, एक तो इससे आपको निरंतर आमदनी होते रहेंगी, दूसरी इससे अधिक संख्या में फल लगते हैं। यानी फल की तुड़ाई फसल पैदावार को बढ़ाने का काम करते हैं।
परवल में नर एवं मादा पुष्प अलग अलग पौधे में लगते हैं, इसलिए बेहतर उपज के लिए जरुरी है नर एवं मादा पुष्प वाले पौधे का संतुलन होना। फसल के उपयुक्त विकास के लिए 10 मादा पौधे में कम से कम एक नर पौधे का होना अति आवश्यक है।
हमनें इस आर्टिकल में परवल की खेती से जुड़ी सभी आवश्यक जानकारी देने का प्रयास किया है। आशा है जो किसान परवल की खेती करना चाहते हैं, वे इस लेख के माध्यम से जरुरी जानकारी प्राप्त कर पाएंगें। परवल की वैज्ञानिक खेती एक लाभकारी व्यवसाय हो सकता है यदि उचित तरीके से एवं सही समय पर इसे उगाया जाए। सही जलवायु, मिटटी, देखभाल एवं सही किस्म का चुनाव इसे एक सफल कृषि व्यवसाय बना सकती हैं।